Tuesday, November 8, 2016

मुस्कान

सुबह, दोपहर, शाम,
मैं जब भी
बाहर निकलता हूँ,

कुछ नन्हें हाथ
मेरे बाजूओं
को पकड़
खींचनें लगते है।

मैं उनकी
मुरझाई
मासूम शक्लों
को देखता हूँ।

कुछ की नजरों में
मुझे
उम्मीद दिखती है,
कुछ के हाथों में
जिम्मेदारियाँ,

खाली पेट
जिम्मेदारियाँ।

कभी कभार,
मैं उनकी भूख
बाँट लेता हूँ,

और उनकी आँखों की चमक,
उनके होठों की मुस्कान
देख
मुस्कुरा लेता हूँ।

4 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 29 अप्रैल 2017 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
    

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  2. सुन्दर रचना ! आदरणीय ,आभार।

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आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद!!!!