Sunday, September 18, 2016

पालिका बाजार की शाम

इतवार का दिन था, सोचा दिल्ली घूम आयें। जाना चाहता था ग़ालिब की हवेली पर पंकज ले गया पालिका बाजार में। कहने में कोई शर्म वाली बात नहीं कि हम तो भाई पालिका बाजार के स्टैण्डर्ड वाले ही बन्दे हैं। वहाँ जाकर देखा कि दिल्ली के डूड लड़के और लड़कियाँ जो अक्सर अपने सादगी पसंद मित्र को स्टाइल में रहने का भाषण देते हैं, वहीं पर अपना फैशन खरीद रहे थे। ख़ैर, हमें क्या लेना देना इन बातों से; हमे तो शॉपिंग करनी थी, अरे हाँ मुझे नहीं सिर्फ पंकज को शॉपिंग करनी थी। उसे ज़ुराबें लेनी थी। कमीना!!! सिर्फ जुराबों के लिए गुडगाँव से दिल्ली ले गया। लेकिन उसने जुराबें भी नहीं ली।

बाजार में दुकानदार लोग आवाज़ें दे देकर बुला रहे थे। जिस दुकान की सजावट थोड़ी अच्छी दिखती हम घुस जाते। टी-शर्ट, शर्ट वगरैह देखने लगते। लेना देना कुछ था नहीं, बस यूँ हीं आये थे तो कुछ तो करना था। बस ऐसे ही एक दुकान पे एक कमीज़ ट्राई की, वापिस दूकानदार को दी और आगे चलने लगे।

दुकान वाला पीछे से चिल्ला कर बोला - "अरे बताओ तो क्या हुआ?"

हम उसकी तरफ मुड़कर मुस्कुराये और फिर चलते रहे।

वो फिर बोला - "आओ तो, और साइज में दिखाता हूँ

"अरे भाई! क्या हुआ?

"ऐसे शॉपिंग करते हो क्या आप लोग?

"भाई!!

"अरे भाई!!"

वो चिल्लाता रहा और हम उसकी तरफ ध्यान दिए बिना ही हँसते हुए चलते गए। कुछ दूर तक तो ऐसे लगा जैसे वो हमारे पीछे ही आ रहा है। पर नहीं, हम जैसे बहुत महारथी थे वहाँ।

आगे चलते हुए एक बैग देखा। मैंने पूछा - "कितने का दिया?"

"1100 का भाई।"

कुछ देर बैग को देखा, अच्छा लगा। लेकिन पालिका बाजार की एक खास बात है, दुकानदार पहली बार में ऊँचा दाम ही बोलता है। हम बैग छोड़ जाने लगे। उसने पीछे से आवाज दी - "भाई, 350 में दे दूँगा।" फिर जो हँसी निकली हमारी बस पूछिये मत। मैं वापिस उसके पास गया और पूछा - "कितने का बोले भाई?"

"अभी तो बताया था भाई, 1100।"

फिर तो हम निकल ही गए। वो पीछे से चिल्लाता रहा। बस अब कुछ नहीं बचा था हमारे लायक वहाँ, हम चले मेट्रो स्टेशन की ओर।

राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से अगर ट्रेन में बैठने को जगह मिल जाये तो..... खैर!!! हमें क्या! हमें कौनसा जगह मिलती है।

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